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0336 : आभारी हूँ सिर मैं झुकाऊं

आभारी हूँ सिर मैं झुकाऊं, जीवन अर्पण मैं करता हूँ, अमूल्य भेंट इससे अधिक क्या?, सम्पूर्ण जीवन मैं सौंपता हूँ । 1. दूर जब जाता हूँ प्रभु के प्रेम से, घायल होता प्रभु का मन, अब न जाऊँगा छोड़ तुझको दूर मैं, सदा तेरे पास रहूँगा मैं । 2. मन मेरा खींचता जग के विभव से, अभिलाषा जो बाधा मेरी, मसीह के अद्भुत प्रेम के लिए ही, सब बाधा को छोड़ता हूँ मैं । 3. प्रेम है आगाध प्रभु जो तेरा, सामर्थहीन हूँ वर्णन के मैं, सदा तक मैं सेवा करूँगा, ऋणी अब हूँ तेरा जो मैं । 4. जग के लिए जीऊँ न मैं अब, न जीऊँगा अपने लिए, तुझे मैं छोड़ जाऊँ कहां अब, ये छोटा जीवन देता हूँ मैं । 5. दुखित होकर पछताता हूँ मैं, बीते दिनों के सब पापों से, बाकी जीवन आभारी होकर, अर्पण करता हूँ सेवा में मैं।