0395 : सृष्टि है तेरी कविता
सृष्टि है तेरी कविता, गाती है सन्ना तेरी, सारी धरा पर गूंजती है नित्य दिन महिमा तेरी। 1. झरने के कल कल भी करते है तेरी महिमा, पक्षी भी गाते हैं तू है कितना महान, वन के सुमन भी है हँसते करते है जय जयकार । 2. दाऊद के गीतों में है, तेरी प्रशंसा की धारा, जन्नत में कहते फरिश्ते, कर्ता है तू ही हमारा, सृष्टि के हर एक कण में बिखरा है तेरा प्यार। 3. नभ की निलिमा सितारे, धरती को करते इशारे, सागर की चंचल मौजे देती है तेरी ही यादें, ऊँचे शिखर भी है कहते तेरी कला है अपार।