0025 : संतोष उमड़ रहा
संतोष उमड़ रहा (2) संतोष उमंड़ ही रहा, हाल्लेलूयाह! यीशु ने मुझे बचाया मेरा पाप धो दिया संतोष उमंड़ ही रहा। 1. रास्ता भटक घूम रहा था उस रास्ते में खोया हुआ था, फ़िर भी यीशु प्यार किया उसने मुझ पर रहम किया, कितना अच्छा यीशु मुझे अपना बनाया। 2. मन न फिराए हुए लोग नरक में रोते रहेंगे, मैं तो सुन्दर स्वर्ग में नया गीत गाऊँगा, कितना अच्छा यीशु मुझे अब तक बचाया।