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0448 : धीरे बहो पावन पवन

धीरे बहो पावन पवन, शीतल करो मन की तपन, हे प्रभु दो हमको ऐसा मन, अभिलाषा का कर सके दमन। 1. सूर्य की प्रथम रश्मि से तुम, चन्द्रमा की शीतल किरण से तुम, दे दो सदा आह्नान यही, मेरी देह के अंग हो हर एक जन। 2. प्रेम और धीरज के उद्गार हो तुम, जल और थल, गगन के आधार हो तुम, पापों का तम जग से हटा, और वास करो तुम हर एक के मन।