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0327 : प्रिय यीशु राजा को मैं देखूं काफी है

प्रिय यीशु राजा को मैं देखूं काफी है, उसके साथ महिमा पाऊँ यही काफी है, स्वर्गीय अनन्त के धाम में मैं पहुंचकर, सन्तों के झुण्ड में रहूं यह काफी है । 1. यीशु के लहू से मैं अब धुलकर, वचन के घेरे में मैं सुरक्षित रहकर, निष्कलंक सन्तों में एक गरीब हूं मैं, लेकिन सोने के पथ में चलूंगा मैं। 2. वीणा जब दुत मिलकर सब बजाएंगे, गंभीर जय ध्वनि का शब्द अद्भुत होगा, हल्लेलूयाह का गीत तब गाया जायेगा, प्रिय यीशु के साथ हर्षित होऊंगा मैं। 3. देखूंगा वह सिर जहाँ कांटों का ताज था, सोने का मुकुट पहिनाऊंगा आनन्द के साथ, पीठ जो कोड़ों से घायल उसको देखकर, हर एक घाव का चुम्बन करूंगा मैं। 4. हृदय स्तुति और धन्यवाद से भरा है, स्मरण करता हूँ मेरा स्वर्गीय भवन है, हल्लेलूयाह, आमीन, हल्लेलूयाह, वर्णन से बाहर मेरी जीभ के वह है।