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0052 : जंगली वृक्षों के दरमियान

1. जंगली वृक्षों के दरमियान एक सेब के पेड़ के समान, नज़र आता है मुझे ऐ मसीह सारे सन्तों के बीच में तू। कोः- हम्द करूं तेरी है प्रभु, अपने जीवन भर इस जंगल के सफर में, गाऊं शुक्र गुजारी से मैं। 2. तू ही है नरगिस खास शारोन का, हां तू सोसन की वादियों का, सन्तों से भी तू है अति पवित्र, कैसा कामिल और शान से भरा। 3. इत्र के समान है तेरा नाम, खुशबू फैलाता है जहाँ में, तंगी,मुसीबत और बदनामी में, बना खुशबूदार तेरे समान। 4. घबराहट की लहरों से गर डूबु दुःखों के सागर में अपने जोरावर हाथ को बढ़ा मुझे अपने सीने से लगा। 5. अभी आ रहा हूँ मैं तेरे पास, पूरी करने को तेरी मर्जी, ताकि दे दूं मैं काम को अंजाम, पाऊं तेरे दीदार में इनाम।