पाठ 31 : तोड़े
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सारांश
यीशु ने कहा, ”स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के समान है, जिसने परदेश को जाते समय अपने दासों को बुलाकर, अपनी सम्पत्ति उन को सौंप दी । उसने एक को पाँच तोड़े, दूसरे को दो और तीसरे को एक तोड़ दिया । (एक तोड़ा 34 किलोग्राम भार की एक इकाई के बाराबर होता था) पहला दास व्यवसायिक प्रवृतिवाला था, इसलिए उस ने तोड़े से लेन-देन किया, और पाँच तोड़े और कमाए । दूसरे दास ने भी ऐसा ही किया और उसने भी दो और कमाए । पर तीसरा दास थोड़ा अलग प्रवृति का था । उसने एक गड्ढा खोदा और उसमें अपने स्वामी का तोड़ा गाड़ दिया । बहुत दिनों के बाद स्वामी आकर अपने दासों से लेखा लेने लगा । पहला और दूसरे दास ने अपने स्वामी को लाभ के विषय में बताया, जिसे वे दिए गए तोड़े से कमाए थे । उन दोनों दासों से स्वामी ने कहा, ”धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाउँगा, अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो ।“ फिर तीसरा दास सामने आया और कहा, ”हे स्वामी मैं तुझे जानता था, कि तू कठोर मनुष्य है, तू जहाँ कहीं नहीं बोता वहाँ काटता है, और जहाँ नहीं छींटता वहाँ से बटोरता है । सो में डर गया और जाकर तेरा तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया, देख जो तेरा है, वह यह है ।“ तब स्वामी क्रोधित होकर कहने लगा, ”हे दुष्ट और आलसी दास, जब यह तू जानता था, कि जहाँ मैं नहीं बोया वहाँ काटता हूँ, और जहाँ मैंने नहीं छींटा वहाँ बटोरता हूँ । तो तुझे चाहिए था, कि मेरा रूपया सर्राफों को दे देता, तब मैं आकर अपना धन ब्याज समेत ले लेता ।“ उसने तोड़ा उस दास से ले लिया और उसे, उस दास को दे दिया, जिसके पास दस तोड़े थे और आलसी दास को सेवा से बर्खास्त करने का आदेश दिया ।
बाइबल अध्यन
मत्ती 25:14-30 14 क्योंकि यह उस मनुष्य की सी दशा है जिस ने परदेश को जाते समय अपने दासों को बुलाकर, अपनी संपत्ति उन को सौंप दी। 15 उस ने एक को पांच तोड़, दूसरे को दो, और तीसरे को एक; अर्थात हर एक को उस की सामर्थ के अनुसार दिया, और तब पर देश चला गया। 16 तब जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने तुरन्त जाकर उन से लेन देन किया, और पांच तोड़े और कमाए। 17 इसी रीति से जिस को दो मिले थे, उस ने भी दो और कमाए। 18 परन्तु जिस को एक मिला था, उस ने जाकर मिट्टी खोदी, और अपने स्वामी के रुपये छिपा दिए। 19 बहुत दिनों के बाद उन दासों का स्वामी आकर उन से लेखा लेने लगा। 20 जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने पांच तोड़े और लाकर कहा; हे स्वामी, तू ने मुझे पांच तोड़े सौंपे थे, देख मैं ने पांच तोड़े और कमाए हैं। 21 उसके स्वामी ने उससे कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो। 22 और जिस को दो तोड़े मिले थे, उस ने भी आकर कहा; हे स्वामी तू ने मुझे दो तोड़े सौंपें थे, देख, मैं ने दो तोड़े और कमाएं। 23 उसके स्वामी ने उस से कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो। 24 तब जिस को एक तोड़ा मिला था, उस ने आकर कहा; हे स्वामी, मैं तुझे जानता था, कि तू कठोर मनुष्य है, और जहां नहीं छीटता वहां से बटोरता है। 25 सो मैं डर गया और जाकर तेरा तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया; देख, जो तेरा है, वह यह है। 26 उसके स्वामी ने उसे उत्तर दिया, कि हे दुष्ट और आलसी दास; जब यह तू जानता था, कि जहां मैं ने नहीं बोया वहां से काटता हूं; और जहां मैं ने नहीं छीटा वहां से बटोरता हूं। 27 तो तुझे चाहिए था, कि मेरा रुपया सर्राफों को दे देता, तब मैं आकर अपना धन ब्याज समेत ले लेता। 28 इसलिये वह तोड़ा उस से ले लो, और जिस के पास दस तोड़े हैं, उस को दे दो। 29 क्योंकि जिस किसी के पास है, उसे और दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा: परन्तु जिस के पास नहीं है, उस से वह भी जो उसके पास है, ले लिया जाएगा। 30 और इस निकम्मे दास को बाहर के अन्धेरे में डाल दो, जहां रोना और दांत पीसना होगा।
प्रश्न-उत्तर
प्र 1 : स्वामी ने तोड़ों को कैसे बाँटा ?
उ 1 : स्वामी ने एक दास को पाँच तोड़े , दूसरे दास को दो तोड़े और तीसरे दास को एक तोड़ा दिया ।प्र 2 : पहले दो दासों ने अपने तोड़ों का क्या किया ?
उ 2 : पहले दो दासों को जितने तोड़े मिलें थे उतने और कमाएं , यानि पहले दास के पास थे कुल दस तोड़े और दूसरे दास के पास थे कुल चार तोड़े।प्र 3 : तीसरे ने अपनी असफलता के लिये क्या बहाना बनाया ?
उ 3 : तीसरे ने अपनी असफलता के लिये यह बहाना बनाया कि वह जानता था कि स्वामी एक कठोर मनुष्य था जो जहाँ कहीं नहीं बोता था वहाँ कटता था और जहाँ नहीं छींटता था वहाँ से बटोरता था इसलिए वह डर गया और स्वामी को तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया और स्वामी दिखा दिया ।प्र 4 : परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?
उ 4 : परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए हमें परमेश्वर के प्रति विश्वस्त रहना चाहिए ,परमेश्वर दिये वरदानों का परमेश्वर की महिमा के लिए उपयोग करना चाहिए और हमे दिये गये अवसरों का सदुपयोग करना चाहिए ।प्र 5 : प्रभु यीशु ने यह दृष्टांत क्यों कहा ?
उ 5 : प्रभु यीशु मसीह ने यह दृष्टांत इसलिए कहा क्योंकि प्रभु हमसे विश्वस्त सेवक होने की आशा रखते हैं ।संगीत
जो भी तू कर रहा है, यीशु वो देखता है, हर पल का तुझ को इन्सान देना हिसाब होगा।
खुल जायेंगी किताबें, जब भी हिसाब होगा, इन्साफ का तराजू यीशु के हाथ होगा।